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रायपुर एयरपोर्ट की जमीन पर किसान का दावा, सुप्रीम कोर्ट में ₹3500 करोड़ की लड़ाई



35 साल से कानूनी संघर्ष का दावा, कहा- पूर्वजों की जमीन पर बना एयरपोर्ट टर्मिनल और गार्डन; हाईकोर्ट के जांच निर्देशों के बाद सुप्रीम कोर्ट में सुनवाई जारी


रायपुर। राजधानी रायपुर के स्वामी विवेकानंद एयरपोर्ट की जमीन को लेकर एक बार फिर बड़ा कानूनी विवाद सामने आया है। रायपुर के किसान अश्विनी बांधे ने दावा किया है कि एयरपोर्ट की टर्मिनल बिल्डिंग और उसके सामने विकसित गार्डन उनके पूर्वजों की जमीन पर बने हैं। इस दावे के आधार पर उन्होंने सुप्रीम कोर्ट में करीब 3500 करोड़ रुपये के मुआवजे की मांग की है।


अश्विनी बांधे का कहना है कि वर्ष 1942 में द्वितीय विश्व युद्ध के दौरान तत्कालीन सरकार ने एयरफील्ड निर्माण के लिए उनकी जमीन अस्थायी रूप से अधिग्रहित की थी। उनके अनुसार, उपलब्ध सरकारी रिकॉर्ड में 1300 रुपये वार्षिक किराया देने का भी उल्लेख है, लेकिन न तो आज तक किराया मिला और न ही जमीन वापस की गई।


बांधे का दावा है कि वे पिछले 35 वर्षों से इस मामले में कानूनी लड़ाई लड़ रहे हैं। उन्होंने अपने दावे के समर्थन में राजस्व अभिलेख, पुराने सरकारी दस्तावेज, विभिन्न मंत्रालयों के पत्र और पूर्वजों के नाम दर्ज रिकॉर्ड अदालत में प्रस्तुत किए हैं।


इस मामले में हाल ही में बिलासपुर हाईकोर्ट ने दोबारा जांच के निर्देश दिए हैं। इसके बाद मामला सुप्रीम कोर्ट में विचाराधीन है, जहां अंतिम फैसला होना बाकी है। यदि अदालत बांधे के दावे को स्वीकार करती है, तो यह छत्तीसगढ़ के सबसे बड़े भूमि विवादों में से एक साबित हो सकता है।


दावे की मुख्य बातें
किसान अश्विनी बांधे ने सुप्रीम कोर्ट में ₹3500 करोड़ का दावा किया।
एयरपोर्ट टर्मिनल और गार्डन को पूर्वजों की जमीन पर बना बताया।
1942 में युद्धकाल के दौरान जमीन लिए जाने का दावा।
रिकॉर्ड में ₹1300 वार्षिक किराये का उल्लेख होने की बात।
35 वर्षों से कानूनी लड़ाई लड़ने का दावा।
हाईकोर्ट के जांच निर्देशों के बाद सुप्रीम कोर्ट में मामला लंबित।


(नोट: यह दावा याचिकाकर्ता अश्विनी बांधे का है। मामले में अंतिम निर्णय सुप्रीम कोर्ट द्वारा किया जाना शेष है।)

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