किसी को हर साल सेवा विस्तार का इंतजार, तो किसी को एक झटके में पांच साल का भरोसा! शीतल शाश्वत वर्मा की नियुक्ति ने खड़े किए कई सवाल, क्या संविदा के भी बन गए वीआईपी और आम नियम?
छत्तीसगढ़ में सरकारी नौकरी की दुनिया में संविदा नियुक्ति का एक नया अध्याय जुड़ता दिखाई दे रहा है। अब तक संविदा का मतलब था अस्थायी नियुक्ति और हर साल सेवा विस्तार की अनिश्चितता, लेकिन लगता है कि सरकार ने इस परिभाषा को भी नया रूप दे दिया है। यहां संविदा तो संविदा है, लेकिन किसी के लिए एक साल की मेहरबानी और किसी के लिए सीधे पांच साल का भरोसा! ऐसे में सवाल उठना लाजिमी है कि क्या प्रदेश में अब ‘परमानेंट संविदा’ की नई परंपरा शुरू हो गई है?
मामला सरकारी सेवा से वीआरएस लेने वाली आईआरएस अधिकारी शीतल शाश्वत वर्मा का है। सामान्य प्रशासन विभाग ने उन्हें पांच साल के लिए संविदा नियुक्ति देने का आदेश जारी किया है। उनकी पदस्थापना वित्त विभाग के सचिव के रूप में सीएस कार्यालय में की गई है। यानी सरकारी सेवा से विदाई के बाद भी प्रशासनिक पारी पांच साल के लिए तय! इसे प्रशासनिक जरूरत कहें या संविदा व्यवस्था का नया वीआईपी मॉडल, यह तो सरकार ही बेहतर बता सकती है।
हैरानी इसलिए भी है क्योंकि प्रदेश में संविदा पर काम कर रहे दूसरे अधिकारियों के लिए ऐसी पांच वर्षीय सुविधा आमतौर पर दिखाई नहीं देती। विद्युत जनरेशन कंपनी के एमडी एसके कटियार को हाल ही में एक साल का सेवा विस्तार मिला है। मंडी बोर्ड के एमडी महेंद्र सिंह सवन्नी की संविदा अवधि भी एक-एक साल करके बढ़ाई जाती रही है। यानी कुछ अधिकारियों को हर साल अपने पद पर बने रहने के लिए सेवा विस्तार का इंतजार करना पड़ता है, जबकि यहां पांच साल का पूरा पैकेज एक साथ मिल गया।
अब सवालों की बौछार…
क्या पांच साल की संविदा नियुक्ति का प्रावधान सभी अधिकारियों के लिए है? अगर हां, तो बाकी अधिकारियों को यह सुविधा क्यों नहीं मिलती? क्या उनकी सेवाएं पांच साल के लिए उपयोगी नहीं हैं या फिर पांच वर्षीय संविदा का यह विशेषाधिकार चुनिंदा लोगों के लिए ही सुरक्षित है? क्या सरकार ने कोई नई नीति बनाई है, जिसके बारे में बाकी अधिकारी अनजान हैं?
विडंबना देखिए, संविदा का नाम अस्थायी और नियुक्ति की अवधि पांच साल! ऐसे में इसे संविदा कहें या पांच साल की लगभग सुनिश्चित प्रशासनिक पारी? अगर यह नियमसम्मत व्यवस्था है तो सरकार को इसके नियम और चयन के आधार सार्वजनिक करने में संकोच नहीं होना चाहिए।
सबसे बड़ा सवाल यह है कि जब दूसरे अधिकारियों के मामले में हर साल सेवा विस्तार की कसौटी अपनाई जाती है, तो इस मामले में सीधे पांच साल का भरोसा देने की जरूरत क्यों पड़ी? आखिर वह कौन-सा विशेष प्रशासनिक औचित्य है, जिसने पांच साल की संविदा का रास्ता खोल दिया?
बहरहाल, इस नियुक्ति में किसी अनियमितता का निष्कर्ष निकालना उचित नहीं होगा, लेकिन पांच साल की नियुक्ति और अन्य अधिकारियों को मिलने वाले एक वर्षीय विस्तार के बीच का अंतर पारदर्शिता पर सवाल जरूर खड़ा करता है। अब विपक्ष, जनप्रतिनिधियों, पत्रकारों और जागरूक नागरिकों की नजर इस नियुक्ति पर रहेगी। आखिर सरकारी पद जनता के हित में होते हैं, किसी व्यक्ति विशेष की सुविधा के लिए नहीं। सरकार को भी बताना चाहिए कि संविदा के इस नए वीआईपी मॉडल के नियम क्या हैं और क्या यही सुविधा प्रदेश के अन्य पात्र अधिकारियों को भी मिलेगी?
क्योंकि सवाल सिर्फ एक अधिकारी को पांच साल की संविदा देने का नहीं है, सवाल यह है कि जब नियम सबके लिए हैं तो पांच साल का भरोसा सबको क्यों नहीं?
