कभी रिटायरमेंट के बाद पसंदीदा ठिकाना हुआ करता था आयोग, अब अध्यक्ष बनने के लिए कोई तैयार नहीं; एक महीने से खाली कुर्सी, न बायोडाटा आया और न सदस्यों ने दिखाई दिलचस्पी
छत्तीसगढ़ में अफसरशाही का मिजाज भी गजब है। जिस छत्तीसगढ़ लोक सेवा आयोग (सीजीपीएससी) की कुर्सी कभी रिटायरमेंट के बाद अधिकारियों के लिए सबसे आकर्षक और मलाईदार ठिकानों में शुमार होती थी, आज उसी कुर्सी पर बैठने के लिए कोई तैयार नहीं है। हालात ऐसे हैं कि अध्यक्ष का पद एक महीने से खाली पड़ा है, लेकिन सरकार को अब तक ऐसा कोई अफसर नहीं मिला, जो इस कुर्सी पर बैठने के लिए अपना बायोडाटा तक सौंपने की हिम्मत जुटा सके। कह सकते हैं कि पीएससी की कुर्सी का रुतबा तो कायम है, लेकिन उस पर बैठने का आकर्षण गायब हो गया है।
दरअसल, पिछली सरकार के कार्यकाल में पीएससी भर्ती प्रक्रिया में सामने आई कथित गड़बड़ियों और उसके बाद शुरू हुई जांच की आंच ने आयोग की पूरी व्यवस्था को सवालों के घेरे में ला खड़ा किया है। भर्ती घोटाले से जुड़े मामले में कई लोग सलाखों के पीछे पहुंच चुके हैं। ऐसे में अब पीएससी की कुर्सी अफसरों को मलाईदार कम और मुसीबतों का दरवाजा ज्यादा नजर आने लगी है। जिस पद के लिए कभी पर्दे के पीछे जोड़-तोड़ और सिफारिशों की चर्चाएं हुआ करती थीं, आज उसी पद के लिए सन्नाटा पसरा है।
सबसे दिलचस्प पहलू यह है कि सरकार ने अब तक अध्यक्ष पद के लिए किसी अधिकारी की दावेदारी सामने आते नहीं देखी है। वर्तमान आयोग के सदस्यों में भी कोई अध्यक्ष का कार्यभार संभालने को उत्सुक नहीं बताया जा रहा है। यानी कुर्सी खाली है, सरकार इंतजार में है और संभावित दावेदार दूरी बनाए हुए हैं। अफसरशाही के गलियारों में इसे पीएससी के बदले हुए मिजाज और उससे जुड़े जोखिमों के तौर पर देखा जा रहा है।
रेणु पिल्ले के नाम पर चर्चाओं का बाजार गर्म
इस बीच सत्ता और प्रशासनिक गलियारों में वरिष्ठ आईएएस अधिकारी रेणु पिल्ले के नाम की चर्चा तेज है। अंदरखाने में कयास लगाए जा रहे हैं कि मुख्यमंत्री विष्णुदेव साय के सिंगापुर दौरे से लौटने के बाद पीएससी के नए अध्यक्ष को लेकर फैसला हो सकता है और रेणु पिल्ले को यह जिम्मेदारी सौंपी जा सकती है। हालांकि, इस संबंध में अभी कोई आधिकारिक घोषणा नहीं हुई है।
बहरहाल, पीएससी की खाली कुर्सी सरकार के लिए नियुक्ति का सवाल जरूर है, लेकिन अफसरशाही के लिए यह बदलते दौर का संकेत भी है। कभी जिस पद को रिटायरमेंट के बाद ‘आराम और सम्मान’ का ठिकाना माना जाता था, आज वही पद जवाबदेही, जांच और विवादों की आशंका के चलते ‘कांटों का ताज’ बनता दिखाई दे रहा है। सवाल यही है कि आखिर इस कुर्सी पर बैठने के लिए सरकार को किसी अफसर को मनाना पड़ेगा या फिर किसी की लॉटरी निकलेगी?
