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लुप्त होती घोटुल और आदिवासी संस्कृति को बचाने 3 एकड़ में 10 करोड़ हो रहे खर्च

रिपोर्ट / विजय शर्मा …
कोण्डागांव / विलुप्त होती जा रही बस्तर के गांवो से घोटुल की परम्परा को अब शहर में जीवत करने का प्रयास प्रारम्भ हो चुका है। बता दे कि आने वाले दो तीन माह में बस्तर के आदिवासी क्षेत्र से लुप्त होती इस परम्परा को देखनें नई पीढ़ी के साथ ही प्रदेश व देशभर के लोग आएंगे। जिसमें घोटुल के अलावा बस्तर की आदिवासी संस्कृति उनके जनजीवन का भव्य स्वरूप के अनुभव का भी अवसर प्रदान होगा।


जानतें है ऐसे हो रही तैयारी – खिखलपुटी मेटल के पास 3 एकड़ की जमीन पर 10 करोड़ की लागत से साल और सागौन के लठठों पर दो दर्जन से ज्यादा आदिवासी शिल्पकार अपना जादू एकेर रहे हैं। खुबसूरत जीवंत चित्रण के साथ बस्तर की आदिवासी संस्कृति रहन -सहन के साथ आदिवासी सभव्यता का चरित्र – चित्रण दिखाई देगा। उसके साथ यहां आने वाले पर्यटकों के रूकने रहने और इन्हें समझने के लिये यहां गाइड भी उपलब्ध रहेगा।


क्या हैं घोटुल – घोटुल को गांव का युवा गृह भी कहते हैं, ये एक विद्यालय हैं जो बांस या मिट्टी से बना एक घर होता हैं। इस का उददेश्य सामाजिक जीवन का पाठ की शिक्षा देना हैं कई जनजातीय समुदायों में एक बड़े कुटीर को कहते है जिसमें पूरे गांव के बच्चे या किशोर सामूहिक रूप से रहते हैं। यह छत्तीसगढ़ के बस्तर में विशेष रूप से मिलते हैं। अलग-अलग क्षेत्र की घोटुल परम्पराओं में अंतर होता हैं। कुढ में बच्चे घोटुल में ही सोते हैं और अन्य में वे दिनभर वहां रहकर रात को अपने-अपने घरों में सोने जाते हैं। घोटुल में कबीले से संबधित आस्थाएं ज्ञान नृत्य, संगीत, कला और कथाएं सीखी जाती हैं। कुछ में किशोर-किशोरियां आपस में बिना बाधा मिलकर जीवन साथी चुना करते हैं। हालांकि शहरी मान्यताओं के दबाव में धीरे-धीरे अब यह प्रचलन कम हो रहा हैं।


ये बना रहे – कोंडागांव के नंदलाल विश्वकर्मा लौह शिल्पी है। जिन्हें राज्य और राष्ट्रीय पुरूस्कार से नवाजा जा चुका है। उसके साथ नारायणपुर के कलाकार भी जुटे है। जिन्होंने नागपुर में घोटुल और मवालीगुड़ी बनायी हैं इन्ही कलाकारों ने रायपुर मुक्तागन में भी बेहतरीन काम किया है।

कलेक्टर निलकंठ टेकाम – भारत दर्शन के तहत यहां 10 करोड़ की लागत से आदिवासी संस्कृति जो विलुप्त हो रही हैं उसे दिखाने 3 एकड़ क्षेत्र में बनायी जा रही हैं। उनकी संस्कृति से जुड़ी हर चीजे जहां देश विदेश के पर्यटक भी देखने और आदिवासीयों की आने वाली नई पिढ़ी भी इसे देख सकेंगे।

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