नई दिल्ली / 2019 के लोक सभा चुनाव के साथ राजस्थान, मध्य प्रदेश, महाराष्ट्र, मिजोरम, छत्तीसगढ़ और हरियाणा जैसे राज्यों के चुनाव कराए जा सकते हैं।
खबर है कि भाजपा के राष्ट्रीय अध्यक्ष अमित शाह ने विधि आयोग को एक पत्र लिखकर ‘एक राष्ट्र, एक चुनाव’ के समर्थन की बात कही है। लोकसभा के एक पांच वर्षीय कार्यकाल में औसतन हर साल पांच से सात राज्यों में विधानसभा चुनाव होते रहते हैं। इससे समूचा देश कभी राष्ट्रीय स्तर पर, राज्य स्तर या स्थानीय स्तर पर किसी न किसी चुनावी मोड में ही रहता है। यह चुनाव प्रक्रिया सार्वजनिक खजाने पर भारी बोझ डालती है। इस व्यय को पांच साल में सभी चुनाव एक साथ कराकर आसानी से कम किया जा सकता है। शाह ने शुक्रवार को विधि आयोग के अध्यक्ष न्यायमूर्ति बलबीर चौहान को लिखे अपने पत्र में एक चौंकाने वाले तथ्य का जिक्र किया है।
बता दें कि नरेंद्र मोदी के नेतृत्व वाली केंद्र सरकार एक देश एक चुनाव की पैरवी करती रही है।
महाराष्ट्र में 2016-17 के दौरान 365 दिन में से कोई न कोई हिस्सा 307 दिन के लिए आचार संहिता के अधीन था। सारा प्रशासन इन्हीं चुनावों में लगा रहता है। चुनाव में व्यस्त रहने के कारण अधिकारी एवं कर्मचारी विकास योजनाओं पर ध्यान नहीं दे पाते।
एक राष्ट्र, एक चुनाव की अवधारणा नई नहीं है। 1983 में प्रकाशित भारतीय निर्वाचन आयोग की पहली वार्षिक रिपोर्ट में एक राष्ट्र-एक चुनाव का सिद्धांत नजर आया था। साल 2015 में संसद की स्थायी समिति की 79वीं रिपोर्ट में इस सिद्धांत की झलक देखने को मिलती है।
5 सितंबर 2016 को तत्कालीन राष्ट्रपति प्रणब मुखर्जी ने समकालिक चुनाव आयोजित करने के विचार को स्पष्ट करते हुए कहा था, ‘वर्तमान में पूरे देश में कहीं न कहीं चुनाव हो रहे हैं। इस वजह से नियमित कार्य रुक जाते हैं, क्योंकि उस दौरान आचार संहिता लागू होती है।
इससे न केवल राज्यों के, बल्कि केंद्र सरकार के काम भी बंद हो जाते हैं। हमारी संसदीय नीतियों को सफलतापूर्वक कार्यान्वित कर हमने अपनी क्षमता साबित की है। राजनीतिक दलों के सभी सदस्यों को इस समस्या और राजनीतिक स्थिरता निर्धारित करने के मुद्दों के बारे में सोचना होगा।’
