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पटाखे तो बहुत जले बस धुंआ हाथ आया, निगम मंडल में कोरिया को हासिल आया शून्य

कोरिया / यह सवाल है या फिर जवाब आपको तय करना होगा। प्रदेश की सरकार ने अपने सारे खास और उनके भी खासमखास को एक सिरे से रेवड़ी बांटने के लिए निगम और मंडल में पदाधिकारी और उनके सदस्यों की लम्बी चौड़ी सूची जारी कर दी। लम्बे इंतजार के बाद जारी की गई इस सैंकड़ा छूती सूची में कोरिया के किसी जनप्रतिनिधि को जगह नही मिल सकी।

कोरिया जिले में जनचर्चा का यह पूरा मसला कल दोपहर बाद शुरू हुआ है जब सूची जारी की गई। बहुत से नेताजी इस आस में टकटकी लगाए बैठे थे कि शायद केक कटे तो उनमें भी बंटे, पर वाह रे किस्मत। धोखा लिखा था वही मिला वह भी सूद समेत। बहरहाल इस सूची में कोरिया को जगह ना मिलने का कारण ऐसा भी हो सकता है कि कोरिया जिले में नेताओं की अधिकता इतनी ज्यादा हो गई है कि सबको खुश रखने के लिए, किसी को भी जगह ना दी जा सकी या फिर यह कहना ज्यादा उचित होगा कि जनाधार विहीन नेताओं की आपसी रंजिश के कारण किसी भी गुट को तवज्जो मिलना मुश्किल है। ऐसा नहीं है कि यंहा जमीनी स्तर के सक्रिय नेताओ की कमी है पर वह जनप्रतिनिधियों की आपसी खींचतान का शिकार हो गए। चलिए अब नजर डालते हैं उस सूची पर जिसने प्रदेश में जनपद पंचायत के सदस्य स्तर तक के नेताओं को निगम मंडल में जगह दिला दी परन्तु वाह रे कोरिया का नेतृत्व जो 91 नेताओं की लिस्ट में अपने किसी एक व्यक्ति को जगह नहीं दिला सके। आप यह भी जान लें कि 90 नेताओं की इस सूची में कोरिया के किसी भी नेता को जगह ना मिलने की वजह क्या है। कयास लगाए जा रहे हैं कि आपसी खींचतान और एक बड़े नेता की व्यक्तिगत नाराजगी इस जिले को भारी पड़ गई। कुछ दिन पहले यंहा से जिलाधिकारी का ट्रांसफर हुआ उस घटनाक्रम के दूरगामी परिणाम अब नजर आने लगे हैं। यह बात अलग है कि पूर्वाग्रह रखने वाले उस अधिकारी का कार्यकाल सिर्फ एक नेता और उनके मीडिया सहयोगी पर ही टिका हुआ था।


विदाई हुई तो ऐसी जो सारे प्रदेश में मिसाल हो गई। अब इस बात की कड़वाहट सबसे ज्यादा यंहा के एक कद्दावर नेता के लिए गहरी चोट साबित हुई। चर्चा है कि जिलाधिकारी उनकी शह पर ही मैदान में टिके थे।एक रस्सी को दो तरफ से खींचने की बात सभी जानते हैं पर कोरिया में इसे तीन तरफ से खींचा जा रहा है। हर बार की तरह इस बार भी एक बात शत प्रतिशत सत्य साबित हुई कि कोरिया कुमार के बाद अब कोई जनाधार वाला नेता कोरिया में नही है जो खुद की काबिलियत पर सत्ता से अपने मन की करवा सके। भले ही विपक्ष में क्यों ना हो। आपको बताते चलें कि बीते कार्यकाल की प्रदेश में कैबिनेट मंत्री के पद के लिए विपक्ष में रहकर भी अपनी चलवाने की काबिलियत के रसूखदार कुमार साहब यानी डॉ रामचन्द्र सिंहदेव जैसे नेता की कमी आज कोरिया के आम नागरिकों को खल रही होगी। खैर कोरिया के निर्वाचित जनप्रतिनिधियों में जिस तरह की अंदरूनी उठापटक चल रही है वह राज्य सरकार से छुपी नहीं है नतीजा सबके सामने है।

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