दो डीएसपी पर उठी उंगलियां, जांच की चर्चा से महकमे में हलचल
रायपुर। छत्तीसगढ़ को 31 मार्च 2026 को नक्सलवाद मुक्त घोषित किए जाने के बाद भी नक्सलियों के पुराने ठिकानों और छिपाए गए हथियार, गोला-बारूद तथा अन्य सामग्री की तलाश लगातार जारी है। सुरक्षा बलों के सर्च ऑपरेशनों में हथियारों के साथ नगदी बरामद होने के मामले भी सामने आते रहे हैं। लेकिन अब इसी नगदी को लेकर एक ऐसी चर्चा ने पुलिस महकमे में हलचल पैदा कर दी है, जिसके सच और झूठ का फैसला जांच के बाद ही संभव है।
बताया जा रहा है कि करीब छह-सात महीने पहले धमतरी जिले से लगे एक जिले के गांव में चलाए गए सर्च अभियान के दौरान नक्सलियों के एक कथित ठिकाने से कई लाख रुपये की नगदी बरामद हुई थी। चर्चा है कि बरामद रकम को सरकारी रिकॉर्ड में जमा किए जाने के बजाय मामला कथित तौर पर कहीं और ही रफा-दफा हो गया।
सबसे गंभीर बात यह कही जा रही है कि इस सर्च अभियान में डीएसपी स्तर के दो अधिकारी भी शामिल थे और कथित तौर पर बरामद रकम के बंटवारे की बात सामने आई है। हालांकि, इन आरोपों की स्वतंत्र पुष्टि नहीं हुई है और न ही इस संबंध में आधिकारिक रूप से कोई स्पष्ट जानकारी सामने आई है।
सरकारी माल था या ‘मौके की बरामदगी’?
अगर वास्तव में नक्सली ठिकाने से इतनी बड़ी रकम बरामद हुई थी, तो सबसे बड़ा सवाल यही है कि उसकी जब्ती का पंचनामा कहां है? रकम किस खाते में जमा हुई? केस डायरी में इसका उल्लेख है या नहीं?
सर्चिंग में मिली एक-एक गोली और हथियार का हिसाब रखा जाता है, तो फिर नगदी के मामले में हिसाब-किताब की किताब अचानक इतनी पतली कैसे हो गई—यही सवाल अब चर्चा का विषय बना हुआ है।
महकमे में यह भी कानाफूसी है कि मामले को लेकर कोई जांच रिपोर्ट तैयार हो चुकी है और संबंधित अधिकारियों के तबादले की चर्चा भी है। यदि ऐसा है तो सवाल और बड़ा हो जाता है कि क्या तबादला ही जांच का अंतिम अध्याय होगा, या बरामदगी की रकम और उसकी कथित गुमशुदगी की पूरी कहानी भी सामने आएगी?
तबादला काफी है या जवाब भी चाहिए?
पुलिस विभाग में तबादला प्रशासनिक प्रक्रिया हो सकती है, लेकिन यदि सरकारी अभियान में बरामद नगदी के गबन या बंटवारे जैसे आरोपों में प्रथमदृष्टया सच्चाई मिलती है, तो मामला केवल कुर्सी बदलने तक सीमित नहीं रहना चाहिए। आखिर सवाल सिर्फ लाखों रुपये का नहीं, बल्कि सर्च ऑपरेशन की विश्वसनीयता और सरकारी रिकॉर्ड की पारदर्शिता का भी है।
फिलहाल पूरा मामला सुनी-सुनाई चर्चाओं और अपुष्ट आरोपों के दायरे में है। इसलिए असली सच जांच और आधिकारिक रिकॉर्ड सामने आने के बाद ही स्पष्ट होगा। लेकिन अगर बरामदगी हुई थी और सरकारी रिकॉर्ड में रकम नहीं पहुंची, तो फिर सवाल सीधा है—नक्सलियों के ठिकाने से निकले रुपये आखिर किसके ठिकाने तक पहुंचे?
अब निगाह इस बात पर है कि विभाग इस चर्चा को महज अफवाह मानकर छोड़ देता है, अधिकारियों का तबादला करके फाइल बंद करता है या फिर बरामदगी से लेकर रकम के सरकारी खाते तक पहुंचने की पूरी कड़ी की निष्पक्ष जांच कर सच सामने लाता है।
