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मजहब की सीमाओं से परे बंजारी वाले बाबा की दरगाह, रायपुर में भाईचारे की अनूठी मिसाल

मोतीबाग की दरगाह में सभी धर्मों के लोगों की अटूट आस्था, उर्स में उमड़ रहे जायरीन; हजरत सैय्यद शेर अली आगा को अकीदत पेश कर अमन-चैन, खुशहाली और शिफा की मांग रहे दुआ

रायपुर। छत्तीसगढ़ की राजधानी रायपुर की पहचान केवल उसकी ऐतिहासिक विरासत, मंदिरों और सांस्कृतिक परंपराओं तक सीमित नहीं है, बल्कि यहां की गंगा-जमुनी तहजीब भी शहर को एक अलग पहचान देती है। इसी साझा संस्कृति की एक खूबसूरत तस्वीर मोतीबाग क्षेत्र में स्थित हजरत सैय्यद शेर अली आगा रहमतुल्लाह अलैह की दरगाह पर देखने को मिलती है। अकीदतमंदों के बीच ‘बंजारी वाले बाबा’ के नाम से मशहूर इस सूफी संत की दरगाह पर इन दिनों उर्स मुबारक के अवसर पर श्रद्धालुओं की आवाजाही जारी है। कोई बाबा की चौखट पर चादर पेश करने पहुंच रहा है, तो कोई फातिहा पढ़कर अपने परिवार की सलामती, कारोबार में बरकत और जीवन में सुख-शांति की दुआ मांग रहा है। यहां आने वाले जायरीन के लिए यह दरगाह महज एक धार्मिक स्थल नहीं, बल्कि आस्था, उम्मीद और इंसानी रिश्तों से जुड़ा एक खास मुकाम है।

एक दरगाह, अनेक आस्थाएं और भाईचारे का पैगाम

मोतीबाग चौक और शास्त्री मार्केट के आसपास स्थित बंजारी वाले बाबा की दरगाह वर्षों से विभिन्न धर्मों के लोगों की श्रद्धा का केंद्र बनी हुई है। स्थानीय मान्यताओं के अनुसार, यहां हिंदू, मुस्लिम, सिख और ईसाई समुदाय के लोग भी अपनी मन्नतें लेकर पहुंचते हैं। कोई नारियल चढ़ाता है, कोई चादर पेश करता है और कोई खामोशी से हाथ उठाकर अपने परिवार और अपनों के लिए दुआ करता है।

दरगाह की सबसे बड़ी खासियत यही साझा आस्था है, जहां लोगों की पहचान उनके मजहब से ज्यादा उनकी इंसानियत और विश्वास से होती है। अलग-अलग धार्मिक परंपराओं को मानने वाले लोगों का एक ही स्थान पर श्रद्धा के साथ पहुंचना रायपुर की सामाजिक समरसता और आपसी भाईचारे की परंपरा को दर्शाता है।

अफगानिस्तान से रायपुर आने की प्रचलित मान्यता

बंजारी वाले बाबा के जीवन से जुड़ी कई बातें स्थानीय लोगों और अकीदतमंदों के बीच प्रचलित हैं। स्थानीय मान्यता के अनुसार, हजरत सैय्यद शेर अली आगा लगभग वर्ष 1965 में अफगानिस्तान से रायपुर आए थे। बताया जाता है कि वे बंजारी माता मंदिर के आसपास रहने लगे थे। इसी वजह से लोगों के बीच उनकी पहचान धीरे-धीरे ‘बंजारी वाले बाबा’ के नाम से स्थापित हो गई।

उनके जीवन, आध्यात्मिक साधना और जरूरतमंदों के प्रति सेवाभाव से जुड़ी चर्चाएं समय के साथ लोगों के बीच फैलती गईं। वर्ष 1982 में उनके विसाल यानी निधन के बाद उनकी स्मृति में दरगाह स्थापित किए जाने की जानकारी स्थानीय लोगों द्वारा दी जाती है। हालांकि, उनके जीवन से जुड़े इन विवरणों की स्वतंत्र ऐतिहासिक पुष्टि आवश्यक है। आज यह दरगाह शहर की धार्मिक और सांस्कृतिक विरासत का महत्वपूर्ण हिस्सा मानी जाती है।

‘हाजरी’ की परंपरा, सुकून और शिफा की उम्मीद

बंजारी वाले बाबा की दरगाह से जुड़ी ‘हाजरी’ की परंपरा भी श्रद्धालुओं के बीच विशेष महत्व रखती है। मान्यता है कि मानसिक बेचैनी, भय और जीवन की परेशानियों से जूझ रहे कुछ लोग यहां दुआ करने और आध्यात्मिक सुकून पाने के लिए पहुंचते हैं। श्रद्धालु फातिहा पढ़ते हैं, अपनी परेशानियां साझा करते हैं और बाबा के प्रति अकीदत जाहिर करते हुए राहत की उम्मीद रखते हैं।

कई जायरीन इस स्थान को शिफा और सुकून की उम्मीद से जोड़कर देखते हैं। उनके लिए दरगाह पर कुछ पल बिताना, दुआ करना और अपनी मन की बात कहना भावनात्मक संबल का माध्यम बनता है। हालांकि, ऐसी आध्यात्मिक मान्यताओं को चिकित्सकीय उपचार का विकल्प नहीं माना जाना चाहिए। मानसिक या शारीरिक स्वास्थ्य संबंधी समस्याओं में योग्य चिकित्सक से परामर्श लेना जरूरी है।

उर्स पर अकीदत का माहौल, दुआओं में उठते हाथ

सूफी परंपरा में उर्स का विशेष महत्व होता है। यह सूफी संत के विसाल की याद में मनाया जाने वाला धार्मिक अवसर है, जिसमें श्रद्धालु उनकी स्मृति में इबादत और दुआ करते हैं। बंजारी वाले बाबा के उर्स के दौरान भी दरगाह पर अकीदतमंद अपनी श्रद्धा अर्पित करने पहुंच रहे हैं।

दरगाह में चादर पेश करने, फातिहा पढ़ने और अमन-चैन की दुआ मांगने जैसी धार्मिक परंपराओं के बीच श्रद्धा का माहौल दिखाई देता है। उर्स के अवसर पर लंगर और कव्वाली जैसे आयोजन भी सूफी संस्कृति की पहचान रहे हैं। इन कार्यक्रमों के माध्यम से धार्मिक परंपराओं के साथ मेल-मिलाप और सामुदायिक सहभागिता को भी बढ़ावा मिलता है।

रायपुर की गंगा-जमुनी तहजीब की जीवंत पहचान

भारत की सूफी परंपरा प्रेम, करुणा, सेवा और इंसानियत का संदेश देती रही है। बंजारी वाले बाबा की दरगाह को लेकर लोगों की साझा आस्था भी इसी परंपरा की याद दिलाती है। यहां आने वाले श्रद्धालुओं के लिए दुआ और इबादत के साथ आपसी सद्भाव का भाव भी महत्वपूर्ण है।

शहर की भागदौड़ भरी जिंदगी में ऐसे धार्मिक स्थल लोगों को कुछ पल ठहरने, मन की शांति तलाशने और अपने विश्वास से जुड़ने का अवसर देते हैं। दरगाह पर विभिन्न धर्मों के लोगों की मौजूदगी यह संदेश देती है कि आस्था का रास्ता अलग हो सकता है, लेकिन इंसान की उम्मीदें, दुख-सुख और अपनों के लिए की जाने वाली दुआएं अक्सर एक जैसी होती हैं।

आस्था से आगे, इंसानियत का रिश्ता

बंजारी वाले बाबा की दरगाह रायपुर की उस सांस्कृतिक विरासत की याद दिलाती है, जिसमें विविधता के बीच एकता और धार्मिक आस्था के साथ सामाजिक सद्भाव को महत्व दिया जाता है। यहां आने वाला हर जायरीन अपने विश्वास के अनुरूप दुआ करता है और बेहतर जीवन की उम्मीद लेकर लौटता है।

दरगाह की पहचान केवल इससे नहीं बनती कि यहां कितने लोग मन्नत मांगने आते हैं, बल्कि इस बात से भी बनती है कि यह स्थान अलग-अलग समुदायों के लोगों को एक साथ आने का अवसर देता है। यही साझा विरासत रायपुर की खूबसूरती है—जहां मजहब अलग हो सकते हैं, इबादत के तरीके अलग हो सकते हैं, लेकिन अमन, मोहब्बत, खुशहाली और इंसानियत की चाह सभी के दिलों में एक जैसी रहती है।

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