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अजब गजब परम्परा – मृत्यु के बाद भी अपनों की जिवंत रखने का प्रयास, पिढ़ी दर पिढ़ी मौते के बाद अपनों की कब्र पर बनाते हैं स्मारक

कोंडागांव / मृत्यु एक अटल सत्य है पर किसी अपने को खोने का दर्द वाकई बड़ा होता है और समय रहते हम उनको भुल जाते है उन्हें रोजमर्रा के भागा – दौड़ में याद नहीं कर पाते। इन सब के वावजुद छत्तिसगढ़ बस्तर संभाग के कोंडागावं में आदिवासी समाज लंबे समय से पिढ़ी दर पिढ़ी परिवार के सदस्यों की मौते के बाद भी उनकी यादों को जिंदा रखने कब्र पर बनाता हैं स्मारक। एैसे सैंकड़ो मकबरे जिले में देखे जा सकते हैं, जहां मौत के बाद भी उनकी देखरेख सजाने सवारने से लेकर दिये तक जलते हैं और इन मकबरों की परिवार के सदस्य पुरी देखरेख करते हैं।

मौत के बाद भी मरने नहीं देते अपनों को ये संस्कृति हैं । आदिवासी समाज की पूरे जिले भर में हर जगह दिखगें ऐसे मृतकों को बनाये गये मृत्यु के बाद स्माकर जिसे देखते ही आपको पता चल जायेगा को इसकी मौत कब हुई मृतक की किस कार्य में रूचि थी वो क्या खाता था ये जब स्माकर देखकर पता चल जाता हैं ।
bastar newspage13 (2)कुछ खास हैं इन स्माकर में – आदिवासी समाज में यह परम्परा हैं की मृतक का दाह संस्कार दफनाकर करते उसके बाद यहां उसका सिमेंट का पक्का स्माकर बना दिया जाता है। जिसके बाद उस स्मारक के उपर उस व्यक्ति का पुरा उल्लेख कब जन्म हुआ कब मृत्यु भी लिखने के साथ – साथ उसकी रूचि जिस कार्य में वह रहे थे उसकी प्रतिमा स्माकर के उपर जैसे किसान था तो बैलगाड़ी के साथ जवान था तो पुलिस की वर्दी, सरपंच था तो कुर्सी में बैठा, खेल में रूचि तो खेलता हुआ, मदिरा प्रेमी था तो वहा शराब की बोतले रख देते है।
bastar newspage13खास मौकों पर स्माकर सजाते है – प्रतिवर्ष दिपाली दशहरे और घर में शुरू कार्य के दैरान जब घरों का रंग – रोगन होता हैं तो उन स्माकरों को उसी प्रकार सजाया – संवारा और रंगों से उकेर कर सुंदर बनाया जाता है। साथ ही वहां मृतक के पंसद के खाद्य पर्दाथ भी रख कर आते हैं। दिया जलाकर ये परंपरा आदिवासी समाज में पीढ़ी दर पीढ़ी चली आ रही है, अपने मृतक परिजनों की वर्षो पूर्व मौत के बाद भी उनके साथ अपने संबध स्माकरों के साथ आज भी बनाये हुए है।
bastar newspage13 (1)स्वंय की भूमि में बना देते है, स्मारक – मौत के बाद भी अपने परिजन को अपने से दूर नहीं जाने देते है इन स्मारकों का समय – समय पर अच्छी तरह ख्याल रखा जा सके जिसके लिय यह अपनी ही कृषि भूमि या बाढ़ी में दफन कर अपने बीच ही इन्हें रखते हैं, मृतक को परिवार के एक सदस्य की तरह उसकी पुरी देखरेख करते हैं, और यह परंपरा आज – काल से नहीं बल्कि सदीयों से चली आ रही है।
नरेन्द्र , बुधमन, सुकमन, जयमन, सुकारों, जयमती, बधयारीन ने बताया की – समाज में परम्परा हैं । हमारे पूर्वज और पजिरन जो अब हमारे बीच नहीं हैं। हम आज भी उनके सम्पर्क में रहते हैं। उसका बड़ा कारण हैं की हम स्मारक बना देते हैं। उनकी मौत के बाद हमारा यह प्रयास होता हैं की हम स्वयं की भूमि पर ही स्माकर बनाये जिस्से की हम अपना समय और अपना जीवन अधिक से अधिक उनके साथ गुजार सके। उसकी पंसद और रूचि के अनुसार स्माकर पर उनकी उसी प्रकार प्रतिमा भी बनाते हैं और हर शुभ कार्य में उनको भी याद करते है।

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