नई दिल्ली / आज से 75 साल पहले गुलामी की जंजीर को उखाड़ फेंकने के लिए महात्मा गांधी के आह्वान पर पूरा देश करो या मरो के संकल्प को लेकर सड़कों पर उतर आया था। डॉ. यूसुफ़ मेहर अली के अंग्रेजों भारत छोड़ो के नारे ने देश में क्रांति का माहौल पैदा कर दिया था। साल 1942 में अगस्त के महीने में शुरु हुई इस क्रांति के पांच साल बाद ही देश अगस्त के महीने में आज़ाद हो गया। 1942 के भारत छोड़ो आंदोलन को 75 साल पूरे हो गए हैं और इस मौके पर कल संसद का विशेष अधिवेशन होगा। इस अधिवेशन में भारत के स्वतंत्रता संग्राम और उसमें स्वतंत्रता सेनानियों की भूमिका को याद किया जाएगा। लोकसभा में चर्चा की शुरुआत विदेश मंत्री सुषमा स्वराज जबकि राज्यसभा में वित्त मंत्री अरुण जेटली करेंगे।
15 अगस्त 1947 भारत की आज़ादी का दिन, ये वो दिन था जिसका इंतजार लंबे समय से लोगों को था। इस दिन का सूरज देखने के लिए भारतीयों को न सिर्फ लंबा संघर्ष करना पड़ा बल्कि बड़ी संख्या में उन्हें कुर्बानी भी देनी पड़ी। हमे आज़ादी तो मिल गई लेकिन इसे पाने के लिए कई अहम पड़ावों से होकर गुजरना पड़ा।
ऐसा ही एक पड़ाव था 8 अगस्त 1942 का जब बंबई के ऐतिहासिक ग्वालिया टैंक में कांग्रेस ने गांधी जी के भारत छोड़ो प्रस्ताव को कुछ संशोधनों के साथ मंजूर कर लिया। इस ऐतिहासिक सम्मेलन में महात्मा गाँधी ने अपने भाषण में देशवासियों से ‘करो या मरो’ का आह्वान किया। गांधी जी ने कहा ‘वह लोग जो कुर्बानी देना नहीं जानते, वे आज़ादी प्राप्त नहीं कर सकते।’ गाँधी जी के इन शब्दों ने भारत की जनता पर ख़ासा असर डाला और वे नये जोश, नये साहस, नये संकल्प, नई आस्था, दृढ़ निश्चय और आत्मविश्वास के साथ स्वतंत्रता संग्राम में कूद पड़े। देश के कोने-कोने में ‘करो या मरो’ की आवाज़ गुंजने लगी।
9 अगस्त 1947 गांधी जी के ‘करो या मरो’ के आह्वान के बाद देश भर में अंग्रेजी शासन के खिलाफ गुस्सा भड़क उठा। अंग्रेजों ने बिना देर किए गांधी जी समेत देश के बड़े नेताओं को गिरफ्तार कर लिया। गाँधी जी को पूना के ‘आगा ख़ाँ महल’ में और अन्य नेताओं को दूसरी जेलों में रखा गया। ब्रिटिश सरकार ने जुलूसों पर पाबंदी लगा दी। अंग्रेजों की इस कार्रवाई से जनता में व्यापक आक्रोश फैल गया। जनता ने खुद अपना नेतृत्व संभाल कर जुलूस निकाला और सभाऐं कीं। स्वतन्त्रता आन्दोलन के दौरान यह पहला आन्दोलन था, जो बिना नेतृत्व के बाद भी अपने चरम पर पहुंचा।
सरकार ने जब आन्दोलन को दबाने के लिए लाठी और बंन्दूक का सहारा लिया तो आन्दोलन का रूख बदलकर हिंसात्मक हो गया। अनेक जगहों पर रेल की पटरियां उखाड़ी गईं और स्टेशनों में आग लगा दी गई। संयुक्त प्रांत में बलिया, बम्बई में सतारा, बंगाल में मिदनापुर और बिहार के कुछ हिस्सों में ‘भारत छोड़ो आन्दोलन’ के समय अस्थायी सरकारों की स्थापना की गयी। इस आन्दोलन से सर्वाधिक प्रभावित क्षेत्र थे- बंगाल, बिहार, उत्तर प्रदेश, मद्रास और बम्बई। जयप्रकाश नारायण, राममनोहर लोहिया और अरुणा असिफ़ अली जैसे नेताओं ने भूमिगत रहकर इस आन्दोलन को नेतृत्व प्रदान किया। बम्बई में उषा मेहता और उनके कुछ साथियों ने कई महीने तक रेडियो का प्रसारण किया। इस दौरान देश का शायद ही कोई हिस्सा बचा हो जहां अंग्रेजों भारत छोड़ो के नारे की गुंज सुनाई न दे रही हो।
यह आंदोलन भले ही देश को आज़ाद न करवा पाया हो, लेकिन इसका दूरगामी परिणाम सुखदायी रहे। इसलिए इसे “भारत की स्वाधीनता के लिए किया जाने वाला अन्तिम महान प्रयास कहा गया। अगस्त, 1942 ई. के विद्रोह के बाद प्रश्न सिर्फ़ यह तय करना था कि स्वतंत्रता के बाद सरकार का स्वरूप क्या हो? इस आन्दोलन ने विश्व के कई देशों को भारतीय जनमानस के साथ खड़ा कर दिया। यह एक ऐसा आंदोलन था जो भारत को आज़ाद कराने में सबसे अहम साबित हुआ।
