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नेशनल हेराल्ड को करोड़ों के विज्ञापन पर विधानसभा में सियासी घमासान


रायपुर। विधानसभा के बजट सत्र में सरकारी विज्ञापनों को लेकर बड़ा सियासी विवाद खड़ा हो गया। भाजपा विधायक सुशांत शुक्ला ने जनसंपर्क विभाग द्वारा नेशनल हेराल्ड को दिए गए विज्ञापनों का मुद्दा उठाते हुए सरकार से कई तीखे सवाल किए। इस पर सदन में सत्ता पक्ष और विपक्ष के बीच जमकर बहस हुई।


प्रश्नकाल के दौरान विधायक सुशांत शुक्ला ने पूछा कि वर्ष 2019-20 से 2025-26 के बीच जनसंपर्क विभाग ने National Herald और नवसृजन मैगज़ीन को विज्ञापन मद में कितनी राशि दी। साथ ही उन्होंने यह भी पूछा कि इन संस्थानों का कार्यालय कहां है और इनका संचालन कहां से होता है।


इस पर मुख्यमंत्री Vishnu Deo Sai ने सदन में विस्तृत जानकारी देते हुए बताया कि नेशनल हेराल्ड को अलग-अलग वर्षों में विज्ञापन दिए गए। सरकार के मुताबिक वर्ष 2019-20 में 34 लाख, 2020-21 में 58 लाख, 2021-22 में 68 लाख, 2022-23 में 1 करोड़ 28 लाख और 2023-24 में 1 करोड़ 36 लाख रुपये के विज्ञापन जारी किए गए। हालांकि 2024-25 और 2025-26 में इस अखबार को कोई राशि नहीं दी गई।


मुख्यमंत्री ने यह भी स्पष्ट किया कि नवसृजन मैगज़ीन को इस अवधि में कोई भुगतान नहीं किया गया। उन्होंने कहा कि नेशनल हेराल्ड के प्रबंधकर्ता Pawan Bansal हैं और इसके मुखिया कौन हैं, यह “पूरा देश जानता है।” मुख्यमंत्री ने यह भी बताया कि Sunday Navjeevan को इसी अवधि में करीब 3 करोड़ 6 लाख रुपये के विज्ञापन दिए गए हैं।


मामले पर पूरक प्रश्न पूछते हुए भाजपा विधायकों ने सरकार को घेरने की कोशिश की। उन्होंने सवाल उठाया कि क्या किसी राजनीतिक दल के विचारों के मुखपत्र को सरकारी धन से विज्ञापन देना उचित है। साथ ही यह भी पूछा गया कि यदि ऐसा हुआ है तो क्या जिम्मेदार अधिकारियों या संबंधित लोगों पर कोई कार्रवाई की जाएगी।


भाजपा विधायक Ajay Chandrakar ने भी सरकार से पूछा कि आखिर किस नीति के तहत नेशनल हेराल्ड को विज्ञापन जारी किए गए और क्या पूरे मामले की जांच कराई जाएगी।


इस पर मुख्यमंत्री ने जवाब देते हुए कहा कि विज्ञापन प्रति पृष्ठ 8 लाख रुपये की दर से जारी किए गए थे और यह पूरी प्रक्रिया विज्ञापन नियमावली 2019 के प्रावधानों के तहत की गई। हालांकि उन्होंने यह भी कहा कि उठे सवालों के मद्देनजर मामले का परीक्षण कराया जाएगा।


नेशनल हेराल्ड को दिए गए विज्ञापनों के आंकड़े सामने आने के बाद सदन में इस मुद्दे को लेकर काफी देर तक सियासी आरोप-प्रत्यारोप का दौर चलता रहा। विपक्ष ने जहां इसे राजनीतिक पक्षधरता से जोड़कर सरकार को घेरने की कोशिश की, वहीं सरकार ने नियमों के तहत विज्ञापन जारी होने की बात कहकर अपना पक्ष रखा।

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