प्रजनन बढ़ाने की योजना पर संशय, विशेषज्ञ बोले—जंगल में जिंदा रहना भी चुनौती
रायपुर, 3 अप्रैल।
करीब दो दशक तक बाड़े में कैद रहने के बाद अब बूढ़े और अंधे वन भैंसा ‘छोटू’ को जंगल में छोड़ने की तैयारी शुरू हो गई है। वन विभाग ने योजना बनाई है कि असम से लाई गई तीन मादा वन भैंसों के साथ उसे रेडियो कॉलर लगाकर उदंती-सीतानदी टाइगर रिजर्व के जंगल में सॉफ्ट रिलीज किया जाएगा। लेकिन इस फैसले को लेकर वन्यजीव विशेषज्ञों और पर्यावरण कार्यकर्ताओं ने गंभीर सवाल खड़े कर दिए हैं—क्या 25 साल का अंधा और कैद का आदी वन भैंसा जंगल में जीवित रह पाएगा?
कमेटी ने बनाया मोड ऑफ ऑपरेशन
छत्तीसगढ़ वन विभाग की छह सदस्यीय कमेटी—जिसमें उदंती-सीतानदी टाइगर रिजर्व के फील्ड डायरेक्टर, डीएफओ बलौदाबाजार, डिप्टी डायरेक्टर, जंगल सफारी और कानन पेंडारी के पशु चिकित्सक तथा एक एनजीओ प्रतिनिधि शामिल हैं—ने 12 जनवरी 2026 की बैठक के बाद यह प्रस्ताव मुख्यालय को भेजा है।
योजना के अनुसार फिलहाल बारनवापारा अभ्यारण्य में रखी गई असम से लाई गई मादा वन भैंसों को उदंती लाया जाएगा। यहां उन्हें 45 दिन तक बाड़े में रखने के बाद छोटू के साथ जंगल में छोड़ दिया जाएगा। विभाग का उद्देश्य छोटू से प्रजनन कराकर राज्य पशु वन भैंसों की संख्या बढ़ाना है।
2006 से कैद में है छोटू
वन भैंसा ‘छोटू’ का जन्म 2002 में हुआ था और वह चार साल तक जंगल में स्वतंत्र विचरण करता रहा। लेकिन 2006 में वन विभाग ने उसे पकड़कर बाड़े में बंद कर दिया।
बताया जाता है कि शुरुआती वर्षों में उससे कई बच्चे पैदा हुए, लेकिन बाद में उन्हें हाइब्रिड या क्रॉसब्रीड बताकर उदंती-सीतानदी टाइगर रिजर्व से बाहर स्थानांतरित कर दिया गया। अब छोटू लगभग 25 साल का हो चुका है और उसकी आंखों की रोशनी भी जा चुकी है।
क्या जंगल में जिंदा रह पाएगा?
6 अगस्त 2025 को वन भैंसा गवर्निंग काउंसिल की बैठक में भी उल्लेख किया गया कि छोटू अंधा है और पूरी तरह बाड़े में रहने का आदी हो चुका है। वन विभाग उसे नियमित रूप से भोजन देता है।
ऐसे में विशेषज्ञों का कहना है कि अचानक जंगल में छोड़ने पर छोटू के लिए जीवित रहना ही सबसे बड़ी चुनौती हो सकती है। अनुमान है कि वह भोजन के लिए बाड़े के आसपास ही भटकता रहेगा और जंगल में दूर तक नहीं जा पाएगा।
मादा वन भैंसों पर भी मंडराएगा खतरा
विशेषज्ञों के मुताबिक अगर छोटू बाड़े के पास ही सीमित रह गया तो मादा वन भैंसें जंगल में अलग-अलग दिशा में चली जाएंगी। ऐसे में प्रजनन की योजना ही अधूरी रह सकती है।
इसके अलावा उदंती-सीतानदी क्षेत्र में समय-समय पर बाघ की मौजूदगी भी दर्ज होती रही है। वन भैंसे आम तौर पर बड़े झुंड में रहते हैं और संकट के समय एक-दूसरे की रक्षा करते हैं, लेकिन तीन मादा और एक शावक का छोटा झुंड शिकारियों के लिए आसान लक्ष्य बन सकता है।
“वन भैंसा बना दिया प्रयोगशाला”
रायपुर के पर्यावरण कार्यकर्ता नितिन सिंघवी ने आरोप लगाया कि पिछले 20 वर्षों से वन विभाग वन भैंसों पर लगातार प्रयोग कर रहा है।
उनके अनुसार 2006 में छोटू को पकड़कर बाड़े में कैद किया गया, फिर ‘आशा’ नाम की हाइब्रिड भैंसा को लाकर उससे बच्चे पैदा करवाए गए। 2014 में क्लोनिंग के जरिए ‘दीप आशा’ पैदा किया गया, जो बाद में मुर्रा भैंसा निकला और आज भी जंगल सफारी में कैद है।
2018 में ‘रंभा’ और ‘मेनका’ नाम की हाइब्रिड भैंसों को लाकर उनसे भी कई बच्चे पैदा करवाए गए, जिन पर करोड़ों रुपये खर्च हुए, लेकिन बाद में सभी को रिजर्व से बाहर रिलोकेट कर दिया गया।
अधिकारियों पर भी उठे सवाल
सिंघवी ने सवाल उठाया कि 2020 और 2023 में असम से मादा वन भैंसें लाई गई थीं, तब उन्हें छोटू के पास क्यों नहीं लाया गया। अगर तब ऐसा किया जाता तो शायद प्रजनन की संभावना ज्यादा रहती।
2030 तक हर साल लाए जाएंगे 10 वन भैंसे
वन विभाग के प्रस्ताव में 2026 से 2030 तक हर साल असम से आठ मादा और दो नर वन भैंसे लाकर उदंती-सीतानदी टाइगर रिजर्व में छोड़ने की योजना है।
हालांकि इस प्रस्ताव में यह स्पष्ट नहीं किया गया है कि फिलहाल बारनवापारा अभ्यारण्य में वर्षों से बाड़े में कैद चार वन भैंसों और उनके बच्चों का क्या होगा।
अब बड़ा सवाल यही है—क्या 20 साल कैद में रहा अंधा ‘छोटू’ जंगल की जिंदगी में लौट पाएगा, या यह प्रयोग उसके लिए आखिरी साबित होगा?
