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भारत के ‘फेफड़े’ अबूझमाड़ पर मंडराया संकट, मुख्य सचिव से संरक्षण की मांग


रायपुर, 21 जून। बस्तर संभाग के अबूझमाड़ क्षेत्र में तेजी से हो रही वन कटाई और प्राकृतिक संसाधनों के दोहन को लेकर चिंता बढ़ गई है।

रायपुर निवासी नितिन सिंघवी ने मुख्य सचिव को पत्र लिखकर अबूझमाड़ के जंगलों को बचाने के लिए तत्काल हस्तक्षेप की मांग की है। उन्होंने दावा किया है कि 31 मार्च 2026 को बस्तर को वामपंथी उग्रवाद मुक्त घोषित किए जाने के बाद विशेष रूप से नारायणपुर जिले के अबूझमाड़ क्षेत्र में सड़क निर्माण, वन भूमि को कृषि भूमि में बदलने, पेंदा (झूम) खेती के नाम पर जंगल साफ करने तथा लकड़ी तस्करी के उद्देश्य से बड़े पैमाने पर पेड़ों की कटाई की गतिविधियां बढ़ी हैं।
पत्र में कहा गया है कि आधुनिक जेसीबी, डोजर और अन्य भारी मशीनों की मदद से प्राकृतिक वनों को तेजी से साफ किया जा रहा है।

विश्वसनीय सूत्रों के हवाले से प्रतिदिन लगभग 50 से 70 हेक्टेयर वन क्षेत्र नष्ट होने का अनुमान भी जताया गया है।


सिंघवी ने बताया कि लगभग 5,000 से 6,000 वर्ग किलोमीटर में फैला अबूझमाड़ मध्य भारत के सबसे बड़े सतत वन क्षेत्रों में शामिल है। यह क्षेत्र बड़ी मात्रा में कार्बन डाइऑक्साइड अवशोषित कर जलवायु संतुलन बनाए रखने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाता है। साथ ही यह छत्तीसगढ़ के राजकीय पशु जंगली भैंसा समेत बाघ, तेंदुआ, भालू और अनेक दुर्लभ वन्यजीवों का महत्वपूर्ण प्राकृतिक आवास है।


भूमि सर्वेक्षण से पहले कटाई पर चिंता
पत्र में कहा गया है कि अबूझमाड़ का आज तक विधिवत भूमि सर्वेक्षण नहीं हुआ है और वर्तमान में सर्वेक्षण की प्रक्रिया जारी है। ऐसे में यह स्पष्ट नहीं है कि कौन-सी भूमि राजस्व विभाग की है और कौन-सी वन विभाग की। सिंघवी ने सर्वोच्च न्यायालय के टी.एन. गोदावर्मन मामले का हवाला देते हुए कहा कि प्राकृतिक वन क्षेत्र प्रथम दृष्टया “डीम्ड फॉरेस्ट” की श्रेणी में आते हैं। इसके बावजूद कई स्थानों पर भूमि की विधिक स्थिति स्पष्ट होने से पहले ही सड़क और अन्य अधोसंरचना परियोजनाओं के लिए बड़ी संख्या में पेड़ों की कटाई की जा रही है।


वन अधिकार अधिनियम को लेकर भ्रम की आशंका
सिंघवी ने दावा किया कि स्थानीय स्तर पर यह अफवाह फैलाई जा रही है कि 31 मार्च 2026 से एक वर्ष के भीतर जंगल काटकर खेती शुरू करने पर वन अधिकार अधिनियम, 2006 के तहत भूमि का पट्टा मिल सकता है। उन्होंने स्पष्ट किया कि अधिनियम के अनुसार अनुसूचित जनजातियों के लिए 13 दिसंबर 2005 या उससे पूर्व का कब्जा तथा अन्य परंपरागत वन निवासियों के लिए उससे पूर्व तीन पीढ़ियों (75 वर्ष) का निवास और वन पर निर्भरता साबित करना आवश्यक है। ऐसे में वर्तमान में जंगल काटकर किए गए नए कब्जों को कानूनी मान्यता नहीं मिल सकती।


अधिकारियों के हवाले से भी जताई चिंता
पत्र में उल्लेख किया गया है कि एक वरिष्ठ प्रशासनिक अधिकारी ने स्वीकार किया है कि यदि एक मामले में कार्रवाई की जाती है तो ऐसे सैकड़ों मामलों में कार्रवाई करनी पड़ सकती है, जिससे व्यापक असंतोष पैदा होने की आशंका है। वहीं वन विभाग के एक अधिकारी के हवाले से कहा गया है कि कई क्षेत्रों में रेंजर, डिप्टी रेंजर और वनरक्षक तक पदस्थ नहीं हैं, जिसका कुछ लोग लाभ उठा रहे हैं।


दिए तीन प्रमुख सुझाव
मुख्य सचिव को भेजे गए पत्र में सिंघवी ने तीन प्रमुख सुझाव दिए हैं—
भूमि सर्वेक्षण पूरा होने तक अनसर्वेक्षित क्षेत्रों में वृक्षों की कटाई वाले सड़क और अन्य अधोसंरचना कार्यों पर रोक लगाई जाए।
वन अधिकार अधिनियम को लेकर फैली भ्रांतियों को दूर करने के लिए स्थानीय भाषाओं में जनजागरूकता अभियान चलाया जाए।
अवैध कटाई, लकड़ी तस्करी और नए अतिक्रमण रोकने के लिए डिस्ट्रिक्ट रिजर्व गार्ड (डीआरजी) की प्रभावी मदद ली जाए।


सिंघवी ने कहा कि अबूझमाड़ केवल छत्तीसगढ़ ही नहीं, बल्कि पूरे देश की प्राकृतिक धरोहर है। यदि समय रहते इसके संरक्षण के लिए प्रभावी कदम नहीं उठाए गए तो भविष्य में इसकी भरपाई संभव नहीं होगी।

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