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किचन शेड में ‘भविष्य’ की पढ़ाई, चार साल से स्कूल भवन का इंतजार, शिक्षा मंत्री कब लेंगे सुध


ब्रजबांधा में 60-65 बच्चों वाले गांव का स्कूल सिमटा दो छात्रों तक, जर्जर भवन तोड़ने के बाद नई इमारत की फाइल अब भी मंजूरी की चौखट पर


बलरामपुर। गांव में स्कूल है, शिक्षक हैं और बच्चे भी हैं… बस स्कूल का अपना भवन नहीं है। लिहाजा नौनिहालों का भविष्य अब किचन शेड की छत के नीचे तैयार किया जा रहा है। यह तस्वीर बलरामपुर जिले के ब्रजबांधा गांव की है, जहां प्राथमिक स्कूल पिछले करीब चार साल से बिना भवन के संचालित हो रहा है। व्यवस्था ऐसी कि जिस गांव में करीब 60-65 स्कूली बच्चे हैं, वहां सरकारी स्कूल में अब केवल दो छात्र ही बचे हैं।


कहानी वर्ष 2022 से शुरू होती है। स्कूल का पुराना भवन जर्जर घोषित हुआ और उसे तोड़ दिया गया। उम्मीद थी कि जल्द ही नया भवन बनेगा और बच्चे सुरक्षित व बेहतर माहौल में पढ़ेंगे। लेकिन चार साल बाद भी नया भवन जमीन पर नजर नहीं आया। हां, प्रस्ताव जरूर आगे बढ़ा है। यानी बच्चों की पढ़ाई भले किचन शेड में चल रही हो, लेकिन सरकारी प्रक्रिया अपनी रफ्तार से चल रही है।


भवन नहीं मिला तो अभिभावकों ने रास्ता बदल लिया
स्कूल भवन नहीं होने का सीधा असर बच्चों पर पड़ा। अभिभावकों ने मजबूरी में अपने बच्चों का दाखिला दूसरे स्कूलों में करा दिया। नतीजा यह हुआ कि 60-65 बच्चों वाले गांव का प्राथमिक स्कूल अब लगभग खाली हो गया। कभी जहां बच्चों की आवाजें गूंजनी चाहिए थीं, वहां अब सिर्फ दो बच्चों के सहारे स्कूल की उपस्थिति दर्ज हो रही है।


दो शिक्षक पदस्थ, एक लंबे समय से अवकाश पर
स्कूल में दो शिक्षक पदस्थ हैं। इनमें से एक शिक्षक लंबे समय से मेडिकल अवकाश पर बताए जा रहे हैं। ऐसे में दो बच्चों वाला स्कूल और एक उपलब्ध शिक्षक—सरकारी शिक्षा व्यवस्था की पूरी तस्वीर जैसे एक छोटे से फ्रेम में दिखाई देती है। सवाल यह भी है कि जब भवन ही नहीं है और अधिकांश बच्चे दूसरे स्कूलों में चले गए हैं, तो विभाग कब इस स्थिति को बदलने की गंभीर पहल करेगा?


‘साल जतन योजना’ में कक्ष स्वीकृत, पैसा अब भी रास्ते में
बताया गया है कि ‘साल जतन योजना’ के तहत स्कूल के लिए कक्ष स्वीकृत किया गया है, लेकिन वित्तीय मंजूरी के अभाव में निर्माण अटका हुआ है। यानी कागज पर स्कूल के भविष्य की तस्वीर तैयार है, मगर जमीन पर अभी भी किचन शेड ही बच्चों का कक्षा-कक्ष बना हुआ है।


ग्रामीणों का कहना है कि चार साल का इंतजार काफी लंबा हो चुका है। बच्चों को किसी अस्थायी व्यवस्था में पढ़ाने के बजाय जल्द से जल्द स्थायी स्कूल भवन बनाया जाना चाहिए, ताकि गांव के बच्चे दोबारा अपने ही स्कूल में लौट सकें।


विभाग का भरोसा—‘मंजूरी मिलते ही निर्माण होगा’
मामले में शिक्षा विभाग का कहना है कि भवन निर्माण का प्रस्ताव शासन को भेजा जा चुका है। वित्तीय स्वीकृति मिलते ही निर्माण कार्य शुरू कराया जाएगा।


अब ग्रामीणों का सवाल सीधा है—जब 2022 में जर्जर भवन तोड़ दिया गया था, तो चार साल बाद भी बच्चों को अपनी छत का इंतजार क्यों है? कागजों में प्रस्ताव और मंजूरी की प्रक्रिया कब पूरी होगी, यह तो विभाग बताएगा, लेकिन फिलहाल ब्रजबांधा के दो बच्चे किचन शेड में बैठकर यही इंतजार कर रहे हैं कि उनका स्कूल आखिर कब स्कूल जैसा दिखेगा।

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