नए शिक्षा सत्र के पहले दिन ही कई जिलों से अव्यवस्था की तस्वीरें सामने आईं, शिक्षक कमी, भवन संकट और विवादित आदेशों ने बढ़ाई सरकार की मुश्किलें
रायपुर/बलरामपुर/बालोद/कवर्धा/अंबिकापुर।
छत्तीसगढ़ में सोमवार से नए शिक्षा सत्र 2026-27 की शुरुआत शाला प्रवेश उत्सव के साथ हुई। सरकारी स्कूलों में बच्चों का तिलक लगाकर स्वागत किया गया, राष्ट्रीय गान, राजकीय गीत और भोजन मंत्र के साथ प्रार्थना सभाएं आयोजित हुईं। शिक्षा विभाग ने नवाचार के साथ गुणवत्तापूर्ण शिक्षा का दावा किया, लेकिन पहले ही दिन प्रदेश के कई जिलों से जो तस्वीरें सामने आईं, उन्होंने सरकारी दावों पर सवाल खड़े कर दिए।
राजधानी रायपुर से लेकर बलरामपुर, बालोद, कबीरधाम और कांकेर तक कहीं जर्जर भवनों में कक्षाएं संचालित हो रही हैं, तो कहीं स्कूलों में शिक्षक नहीं हैं। कई स्थानों पर बच्चों को बरामदे, सामुदायिक भवन और अस्थायी कमरों में बैठकर पढ़ाई करनी पड़ रही है।
सबसे चौंकाने वाला मामला बालोद जिले के डौंडी विकासखंड के प्राथमिक शाला काड़े से सामने आया, जहां 99 बच्चों पर केवल दो शिक्षक होने से नाराज ग्रामीणों ने पहले ही दिन स्कूल में ताला जड़ दिया। स्कूल ड्रेस पहनकर पहुंचे बच्चों को बिना पढ़ाई के वापस लौटना पड़ा। मौके पर बीईओ, तहसीलदार और जनपद सीईओ को पहुंचकर स्थिति संभालनी पड़ी, लेकिन ग्रामीणों ने पर्याप्त शिक्षकों की नियुक्ति तक आंदोलन जारी रखने की चेतावनी दी।
वहीं कबीरधाम जिले के जामुनपानी ग्राम पंचायत स्थित महाराजपुर डी प्राथमिक शाला में नए सत्र के पहले दिन मुख्य द्वार पर ताला लटका मिला। न तो कोई शिक्षक मौजूद था और न ही विद्यालय परिसर में किसी प्रकार की गतिविधि दिखाई दी। स्थानीय लोगों ने इसे शिक्षा विभाग की लापरवाही बताते हुए जिम्मेदार अधिकारियों पर कार्रवाई की मांग की है।
बालोद जिले में स्थिति और भी चिंताजनक है। जिला शिक्षा विभाग के अनुसार 64 स्कूल भवन इतने जर्जर हो चुके हैं कि उन्हें डिस्मेंटल योग्य घोषित किया जा चुका है, जबकि 18 स्कूलों के पास अपना भवन ही नहीं है। कई स्कूलों में पुस्तकालय, प्रयोगशाला और प्रधानपाठक कक्ष को ही कक्षाओं में बदल दिया गया है। बरसात के मौसम में टपकती छतों और कमजोर दीवारों के बीच हजारों बच्चों की सुरक्षा को लेकर गंभीर सवाल उठ रहे हैं।
बलरामपुर जिले के कोटराही पंचायत स्थित भुइयापारा प्राथमिक शाला की हालत भी चिंताजनक है। यहां जर्जर दीवारों, टपकती छत और बदहाल शौचालय व्यवस्था के बीच बच्चों को पढ़ाई करनी पड़ रही है। ग्रामीणों ने लंबे समय से भवन मरम्मत और मूलभूत सुविधाओं की मांग की है, लेकिन अब तक समाधान नहीं हो सका है।
उधर, नए शिक्षा सत्र के पहले ही दिन शिक्षा विभाग के उस आदेश ने भी सियासी विवाद खड़ा कर दिया, जिसमें सरकारी स्कूलों की प्रार्थना सभा में गायत्री मंत्र का उच्चारण अनिवार्य करने की बात कही गई है। पूर्व उपमुख्यमंत्री टीएस सिंहदेव ने इस फैसले की आलोचना करते हुए कहा कि संविधान प्रत्येक नागरिक को धार्मिक स्वतंत्रता का अधिकार देता है और किसी भी धार्मिक प्रार्थना को अनिवार्य बनाना उचित नहीं है। उन्होंने सरकार से आदेश वापस लेने और इसे पूरी तरह स्वैच्छिक रखने की मांग की।
एक ओर सरकार शत-प्रतिशत नामांकन और गुणवत्तापूर्ण शिक्षा का दावा कर रही है, वहीं दूसरी ओर शिक्षक संकट, भवनों की बदहाली, बंद पड़े स्कूल और मूलभूत सुविधाओं के अभाव ने यह सवाल खड़ा कर दिया है कि आखिर प्रदेश के बच्चों को सुरक्षित और बेहतर शैक्षणिक माहौल कब मिल पाएगा। नए शिक्षा सत्र के पहले ही दिन सामने आई ये तस्वीरें बताती हैं कि शिक्षा व्यवस्था में अभी भी कई बुनियादी चुनौतियां बाकी हैं, जिन पर तत्काल और ठोस कार्रवाई की जरूरत है।
